मंगलवार, 29 जुलाई 2014

गैरों में अपने देखते हैं




अपनों में गैर, गैरों में अपने देखते हैं 

अब ये न पूछिए कि हम क्या देखते हैं

 
वो हर हरकत में ढूंढते हैं फितरत हमारी

 
सस्ता कितना हो गया, प्यार देखते हैं


(नरेंद्र 'नरेन')
29.8.2014

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

कंक्रीट का जंगल

शहर देखो तो हमारे
कंक्रीट का जंगल हो गए
घर भी हमारे आज कल
कुश्ती का दंगल हो गए

जिंदगी हमारी कुछ और नहीं
दांव-पेंच तक सिमट कर रह गयी
बात-चीत भी अब तो आपस की
एस एम एस तक निपट कर रह गयी

देखें क्या क्या और कैसे रंग
ये ज़माना हमें आगे दिखायेगा
लेकिन यह शाश्वत सत्य है दोस्तों
आदमी खाली हाथ आया था खाली ही जायेगा

.......© नरेंद्र 'नरेन' १८.४.२०१४