गुरुवार, 25 जुलाई 2013

सब याद है....

"सब याद हैं... "


पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं...  

स्कूल से छुट्टी ले कर दोस्तों के रूम से लड्डू चुराना
खाली डिब्बा दिखा कर फिर जोर से  खिलखिलाना,

भाग कर फिल्में देखना "डिब्बा" सिनेमा-हॉल में रात को 
हॉस्टल से हम ऐसे निकलते थे जैसे चोरों की बारात हो,

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं....  

मैस के पीछे वो बर्तन मांजता, झीखता "टी सी"
सुबह-सुबह खारा सर की वो बेरहम पी टी,

सन्डे की वो धूप में घंटों बैठ कर तेल की मालिश 
स्कूल के काले जूतों पर वो चेरी-ब्लॉसम की पॉलिश,

सातवीं कक्षा की डोरमेट्री में बजरंग जी की डाकू की कहानी 
आठवीं के हॉस्टल-रूम में वो खेल-खेल में "लम्बी घोड़ी" बनानी 

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं ....

बिड़ला पब्लिक स्कूल के लड़कों की मज़ाक उड़ाना 
उनको हर खेल में उनके ही मैदान में खूब हराना,

धीरे से अध्यापकों को उनके मज़ाक-नाम से पुकारना 
उनके घूर कर देखने पर फिर उनसे ही नज़रें चुराना,

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं .......  

हर सन्डे को बिट्स ऑडी में वह नई-नई फिल्में देखना
इंटरवल में ऊपर बालकनी में बैठे सुंदर चेहरों को ताकना,

पूरे सप्ताह फिर उस फिल्म के गाने बाथ-रूम में गुन-गुनाना
बाथ-रूम के बाहर खड़े मुंडू को फिर बड़ा-सा मुक्का दिखाना,

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं ......

घर से आयी माँ की चिट्ठी को बार-बार पढ़ना
कोई और ना पढ़ ले, बुझे मन से उसे फाड़ना 

अकेले में माँ को याद करके वो चुपके से रोना 
जा कर वाश-बेसिन में फिर थोबड़े को धोना,

घर से राखी ना आने पर वो खुद उदास हो जाना 
दोस्तों की बहनों से फिर हंस कर राखी बंधवाना,

घर को याद करके रो रहे दोस्तों को खूब हँसाना 
खुद भी भीगी आँखों से फिर धीरे से मुस्कुराना,


पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं .......


नरेन्द्र 'नरेन'
25.7.2013 

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