मंगलवार, 9 अप्रैल 2013


"गुब्बारों सा चंचल बचपन"

गुब्बारों सा चंचल बचपन, आओ खेलें कहती दिल की धड़कन,
जीवन की इस आपा-धापी में, न जाने कहाँ खो गया बचपन !

बारिश की गीली और सौंधी मिट्टी के, वो कच्चे टेढ़े-मेढ़े  घरौंदे, 
लाल-पीले, नीले-काले रिबनों से गुंथे, वो सहेलियों के लम्बे परांदे,
कुछ भी नहीं भूले, हैं याद आज तक, वो खुले खेत वो ढके बरामदे,
जीवन की इस आपा-धापी में, न जाने कहाँ खो गया बचपन !

नन्हे-नन्हे पैरों से चलकर, वो लम्बी पगडंडियाँ नापना,
लुका-छिपी में पकड़े जाने पर, वो हथेलियों से मुहँ को ढांपना,
कंचे, गिट्टे खेलना, लट्टू घुमाना, तितलिओं के पीछे पहरों भागना,
करके याद बचपन के वो दिन, दिल हो जाता है कतरन-कतरन,
जीवन की इस आपा-धापी में, न जाने कहाँ खो गया बचपन !

नरेन 
५.१.२०१२  

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